देश की आजादी के दिन (15 अगस्त) एक बार फिर ‘वंदे मातरम’ (Vande Mataram) को लेकर राजनीतिक घमासान देखने को मिला। वैसे, राष्ट्रीय प्रतीकों पर सियासत भारत के लिए कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार विवाद के केंद्र में कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं। एक वायरल वीडियो के आधार पर उन पर राष्ट्रगीत को बीच में रोकने का आरोप लग रहा है, जिससे सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं। इसी बीच केंद्र सरकार ने वंदे मातरम को कानूनी संरक्षण देने के लिए एक नया विधेयक भी पारित कर दिया है। लेकिन, इन वैचारिक और प्रतीकात्मक मुद्दों के शोर में देश की असली समस्याएं कहीं दबती हुई नजर आ रही हैं।
क्या है पूरा विवाद? सोनिया गांधी के वीडियो पर बवाल
विवाद की शुरुआत कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह से हुई।
- भाजपा का आरोप: सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसके आधार पर भाजपा नेताओं का दावा है कि सोनिया गांधी ने समारोह के दौरान बज रहे ‘वंदे मातरम’ गीत को बीच में ही बंद करने का आदेश दिया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि कांग्रेस वोट बैंक की राजनीति के लिए वंदे मातरम को भूल रही है और इसके लिए सोनिया गांधी को देश से माफी मांगनी चाहिए।
- कांग्रेस का पलटवार: कांग्रेस ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। पार्टी का स्पष्टीकरण है कि सोनिया गांधी ने वंदे मातरम का पूरा वर्जन गाए जाने से रोकने की कोई कोशिश नहीं की, बल्कि वे सिर्फ कांग्रेस अध्यक्ष के बैठने के लिए कुर्सी मंगाने का इशारा कर रही थीं।
‘राष्ट्रीय सम्मान का अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026’
इस राजनीतिक खींचतान से ठीक पहले, केंद्र सरकार ने संसद में एक बड़ा कदम उठाते हुए “राष्ट्रीय सम्मान का अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026” पारित कराया है। इस नए कानून के तहत वंदे मातरम को भी ‘जन-गण-मन’ (राष्ट्रगान) के समान कानूनी दर्जा और सुरक्षा प्रदान की गई है।
नए कानून के मुख्य प्रावधान:
- समान दर्जा: अब वंदे मातरम का अपमान करना राष्ट्रगान के अपमान के बराबर माना जाएगा।
- सजा का प्रावधान: वंदे मातरम का जानबूझकर अपमान करने या इसके गायन में जानबूझकर बाधा डालने पर दोषी को अधिकतम 3 वर्ष तक की कैद, जुर्माना, या दोनों की सजा हो सकती है।
- मंशा पर जोर: यह कानून मुख्य रूप से ‘जानबूझकर’ किए गए कृत्यों पर लागू होगा; अनजाने में हुई गलती को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जाएगा।
जहां सरकार इसे राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा के लिए जरूरी बता रही है, वहीं विपक्ष का तर्क है कि मौजूदा कानून पहले से पर्याप्त थे और यह नया कानून अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े कर सकता है।
संपादकीय नजरिया: सम्मान स्व-स्फूर्त भाव है, थोपा नहीं जा सकता
राष्ट्रीय गीत हो या राष्ट्रगान, यह देश के हर नागरिक के लिए असीम गौरव का विषय है और किसी को भी इसके अपमान का अधिकार नहीं है। नया कानून सरकार का उचित कदम हो सकता है, लेकिन सत्ता में बैठे लोगों को यह समझना होगा कि सम्मान एक स्व-स्फूर्त भावना (Spontaneous feeling) है। किसी को डराकर, जोर डालकर या कानून के डंडे से मजबूर करके मन में सम्मान पैदा नहीं किया जा सकता।
वैचारिक सियासत या असली मुद्दों से भटकाव?
आजादी के 80 साल बाद भी देश की सियासत प्रतीकों और वैचारिक मुद्दों के इर्द-गिर्द घूम रही है, जबकि जमीनी हकीकत कुछ और ही मांग कर रही है:
- किसानों की बदहाली: देश की सबसे बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है, लेकिन वे आज भी बुनियादी सुविधाओं और उचित मूल्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
- युवा और रोजगार: देश में एक-तिहाई से अधिक युवा हैं, जिन्हें कोरे आश्वासनों की नहीं, बल्कि ठोस रोजगार की जरूरत है।
- गरीबी का दलदल: गरीबों को महज 5 किलो मुफ्त राशन देने से उनका पूर्ण विकास नहीं होगा। उन्हें गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकालने के लिए दीर्घकालिक कार्ययोजना चाहिए।
- शिक्षा और स्वास्थ्य: गांवों में सरकारी स्कूल बदहाल हैं और गरीब नागरिकों के लिए सरकारी अस्पतालों में अच्छे डॉक्टर व दवाइयों का भारी अभाव है।
सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को इन ‘वैचारिक जुगाली’ वाले मुद्दों को दरकिनार कर जनहित के वास्तविक मुद्दों पर केंद्रित होना चाहिए। यदि समय रहते शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और कृषि पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाली पीढ़ी किसी न किसी दिन इन हकीकतों को लेकर सड़कों पर उतरेगी। उस दिन ये सारे वैचारिक मुद्दे बेमानी साबित होंगे। फिलहाल, वंदे मातरम पर जो निरर्थक सियासत चल रही है, उसका जल्द पटाक्षेप होना देशहित में है।

